नई दिल्ली: 79वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक मौके पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की रुकी हुई जनगणना (Census) को लेकर एक बहुप्रतीक्षित और बड़ा ऐलान किया है। 2021 में कोविड महामारी के कारण अनिश्चितकाल के लिए टली जनगणना अब 2025 के अंत से शुरू होगी। सबसे खास बात यह है कि यह भारत के इतिहास की पहली पूरी तरह से 'डिजिटल जनगणना' (Digital Census) होगी।
क्या है डिजिटल जनगणना और यह कैसे अलग होगी?
पीएम मोदी ने अपने भाषण में 'जन-भागीदारी' पर जोर देते हुए कहा कि अब नागरिकों को सरकारी कर्मचारियों के घर-घर आने का लंबा इंतजार नहीं करना होगा। नई प्रक्रिया के तहत:
- सरकार एक विशेष 'जनगणना पोर्टल' और मोबाइल ऐप लॉन्च करेगी।
- नागरिक अपने आधार कार्ड या मोबाइल नंबर के जरिए लॉग-इन करके अपना और अपने परिवार का डेटा स्वयं (Self-Enumeration) भर सकेंगे।
- जो लोग डिजिटल रूप से सक्षम नहीं हैं, उनके लिए पुराने तरीके से प्रगणक (Enumerators) टैबलेट लेकर घर-घर जाएंगे।
जातिगत जनगणना: सबसे बड़ा सवाल और सस्पेंस?
हालांकि, पीएम के पूरे भाषण के दौरान राजनीतिक गलियारों में जिस बात की सबसे ज्यादा चर्चा थी, उस पर सस्पेंस अभी भी बरकरार है—वह है जातिगत जनगणना (Caste Census)। विपक्ष, विशेषकर 'इंडिया' गठबंधन, लंबे समय से ओबीसी (OBC) की सटीक गिनती की मांग कर रहा है।
गृह मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों की मानें तो सरकार जनगणना के फॉर्म में कुछ नए कॉलम जोड़ सकती है, जो 'उप-जातियों' (Sub-castes) का डेटा इकट्ठा करेंगे, लेकिन क्या यह बिहार की तर्ज पर पूरी तरह से जाति आधारित होगा, इस पर सरकार ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं।
विपक्ष का तीखा हमला
पीएम के ऐलान के तुरंत बाद समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्वीट कर निशाना साधा। उन्होंने लिखा, "डिजिटल इंडिया अच्छी बात है, लेकिन जब तक पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की सही गिनती नहीं होगी, तब तक 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा अधूरा है। भाजपा आंकड़ों से डरती क्यों है?" वहीं, कांग्रेस ने इसे टालमटोल की नीति बताया है।
यूपी की राजनीति पर इसका असर
उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह से जाति के समीकरणों पर टिकी है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू होने वाली यह कवायद यूपी की सियासी बिसात को पूरी तरह पलट सकती है। अगर जनगणना में ओबीसी का डेटा सामने आता है, तो आरक्षण की 50% सीमा को बढ़ाने की मांग और जोर पकड़ेगी, जो आने वाले समय में सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा।