नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण देने वाले 103वें संविधान संशोधन को वैध करार दिया है। 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने 3:2 के बहुमत से यह फैसला सुनाया। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने आरक्षण के पक्ष में फैसला दिया, जबकि तत्कालीन सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट ने असहमति जताई।
कोर्ट ने कहा कि EWS कोटा संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं करता है और आर्थिक आधार पर आरक्षण देना भेदभावपूर्ण नहीं है। यह फैसला उन सामान्य वर्ग के छात्रों और नौकरी चाहने वालों के लिए बड़ी राहत है जिनकी पारिवारिक आय 8 लाख रुपये सालाना से कम है।
विपक्ष ने तर्क दिया था कि यह 50% आरक्षण की सीमा (इंद्रा साहनी केस) का उल्लंघन करता है और इसमें एससी/एसटी/ओबीसी गरीबों को बाहर रखना गलत है। लेकिन बहुमत के फैसले ने कहा कि 50% की सीमा अनम्य नहीं है और EWS कोटा एक अलग श्रेणी है। इस फैसले से पूरे देश में दाखिले और भर्ती परीक्षाओं में EWS कोटे का रास्ता साफ हो गया है।