मुंबई: विश्व स्वास्थ्य दिवस (7 अप्रैल) के मौके पर भारत ने चिकित्सा जगत में एक क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल की है। टाटा मेमोरियल सेंटर और आईआईटी बॉम्बे द्वारा विकसित स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी (NexCAR19) का उत्पादन अब बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है। यह थेरेपी ब्लड कैंसर (ल्यूकेमिया और लिंफोमा) के आखिरी स्टेज के मरीजों के लिए 'संजीवनी बूटी' मानी जाती है, जिन पर कीमोथेरेपी का असर होना बंद हो जाता है।
सबसे बड़ी बात इस इलाज की कीमत है। अमेरिका या यूरोप में CAR-T थेरेपी का खर्च 3 से 4 करोड़ रुपये आता है, जो आम आदमी की पहुंच से बाहर है। लेकिन भारत की स्वदेशी तकनीक से अब यह इलाज महज 30 से 35 लाख रुपये में उपलब्ध होगा। सरकार ने इसे आयुष्मान भारत योजना के तहत लाने के संकेत भी दिए हैं, जिससे गरीबों को यह मुफ्त मिल सकेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे "मेक इन इंडिया" की सबसे बड़ी सफलता बताया है।
CAR-T थेरेपी में मरीज के शरीर से टी-सेल्स (T-Cells) निकाले जाते हैं, उन्हें लैब में जेनेटिकली मॉडिफाई करके कैंसर से लड़ने के लिए तैयार किया जाता है, और फिर वापस मरीज के शरीर में डाल दिया जाता है। यह एक तरह की 'लिविंग ड्रग' है। शुरुआती ट्रायल में 70% मरीजों में कैंसर पूरी तरह खत्म (Complete Remission) होते देखा गया है।
देश भर के 20 बड़े कैंसर अस्पतालों में यह सुविधा शुरू कर दी गई है। यह न केवल भारत बल्कि पड़ोसी देशों और ग्लोबल साउथ के मरीजों के लिए भी उम्मीद की नई किरण है, जो महंगे इलाज के अभाव में दम तोड़ देते थे। भारत अब दुनिया का 'फार्मेसी' ही नहीं, बल्कि 'इनोवेशन हब' भी बन रहा है।