नई दिल्ली: योग गुरु बाबा रामदेव और उनकी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद (Patanjali Ayurved) के लिए अप्रैल का महीना मुश्किलों भरा रहा। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रामक विज्ञापनों (Misleading Ads) के मामले में अवमानना नोटिस जारी करते हुए बाबा रामदेव और बालकृष्ण की बिना शर्त माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वे "अभी भी नहीं सुधरे हैं" और उन्हें परिणामों का सामना करना होगा। यह मामला इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) द्वारा दायर याचिका पर चल रहा था।
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आरोप था कि पतंजलि ने एलोपैथी दवाओं के खिलाफ दुष्प्रचार किया और अपनी दवाओं से लाइलाज बीमारियों (जैसे शुगर, बीपी) को जड़ से खत्म करने का झूठा दावा किया, जबकि कोर्ट ने पहले ही ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगाई थी। जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने कहा, "हम अंधे नहीं हैं... आपने कानून की धज्जियां उड़ाई हैं।" कोर्ट ने उत्तराखंड लाइसेंसिंग अथॉरिटी को भी फटकार लगाई कि वे इतने दिनों तक आंखें मूंदे क्यों बैठे थे।
दबाव बढ़ने पर पतंजलि ने अखबारों में बड़े आकार का माफीनामा छापा, जिसमें लिखा था, "अनजाने में हुई गलती के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।" इसके बाद कोर्ट ने कंपनी के कई उत्पादों के विज्ञापनों पर रोक लगा दी।
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यह मामला देश में स्वास्थ्य उत्पादों के विज्ञापन और उपभोक्ता अधिकारों के लिए एक नजीर बन गया है। इसने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी ब्रांड की लोकप्रियता उसे कानून के दायरे से बाहर नहीं कर सकती।