नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने आज (7 नवंबर) एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण को बरकरार रखा है। 5 जजों की बेंच ने 3:2 के बहुमत से फैसला सुनाया कि 103वां संविधान संशोधन वैध है और यह संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं करता है। यह फैसला मोदी सरकार के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है, जिसने 2019 के चुनावों से ठीक पहले यह कानून पास किया था।
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जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने आरक्षण के पक्ष में फैसला दिया। उन्होंने कहा कि आरक्षण केवल सामाजिक पिछड़ेपन तक सीमित नहीं हो सकता, आर्थिक आधार भी प्रासंगिक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 50% की आरक्षण सीमा (इंद्रा साहनी केस) कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है जिसे पार नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि EWS कोटे से SC/ST और OBC को बाहर रखना भेदभावपूर्ण है और यह समानता के अधिकार के खिलाफ है। हालांकि, बहुमत के फैसले के कारण यह कानून अब देश का स्थायी कानून बन गया है। इसका मतलब है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में सवर्ण गरीबों को 10% कोटा मिलता रहेगा।
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भाजपा ने इसे "सामाजिक न्याय की जीत" बताया है, जबकि डीएमके और कुछ अन्य दलों ने इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से अब राज्यों में आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर ले जाने के रास्ते खुल सकते हैं, जिसका असर आने वाले समय में जातिगत राजनीति पर पड़ेगा।